बहुत कुछ जाग रहा है।

बहुत लोग जागते रहते हैं अब रातों को अब ,

शायद वो चौकीदार जो बचपन मे सुनाई देता था ,

“जो कहता था जागते रहो” ,

उस आवाज़ ने जगा रखा

है सबको किसी को आने वाले कल की चिंता है ,

तो किसी को अवसाद ने घेर रखा है ,

किसी के परिवार ने आज कुछ रूखा सूखा खाया है

तो पेट भर के नही खाया होगा तो नींद कहा आएगी ,

तो किसी को पढाई ने जगा रखा है ,

किसी के पास नौकरी नही है बच्चों की फ़ीस अभी

जमा नही हुई है।

बिजली का बिल भी तो बाकी है।

घर मे बुजुर्ग हैं जो बीमार हैं , इलाज कराने ले जाएंगे

तो अभी हाथ तंग है।

त्यौहार का महीना है नए कपड़े , पटाखे , मिठाई का

भी तो खर्चा होगा।

यही सोचता हुआ आम इंसान जी रहा है आज की

तारीख़ में , दिखावा बहुत है अपनापन नही है, मुद्दे

बहुत पर सुनवाई कोई नही , जिंदगी कष्टों का मेला

हो गई है अब तो ,

कोई भी आवाज़ सुनने वाला नही …

जागते रहो मेरे भरोसे मत रहो …

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हवा का वो झोंका

हवा का झोंका यही तो थे तुम मेरे लिए ,

पल भर को आते थे जैसे सदियां लेकर ,

कहने को होता था पर तेरा साथ न होता था ,

चन्द लम्हो में सिमटी सी थी जिंदगी जैसे ,

तेरी आवाज कानो में गूंजती सी रहती थी ,

अगले पल को सुनने तक ,

रातों को बीतने में पल नही लगते थे ,

फिर लगता था अभी सोना भी तो है

कॉलेज भी तो जाना है ,

अजब सा वो साथ ,

अजब सा वो प्यार ,

मतलब नही होता था जब किसी मतलब से हमें ,

प्यार तो वही था बाकी तो धोखा सा था …

हाँ तू वही तो था हवा का झोंका सा था…..

वो जो है नही ,

जिसके लिये मैने खुद को कहि खो दिया था,

अपनी रातों की नींद को न जाने कितना परेशान किया था,

वो पल जो सिर्फ मेरे हो सकते थे , खो दिया उनको पल में मैने ,

वो कई साल जो यूंही बीत गए , न वो साल मेरे हुए न तू मेरा हुआ ,

अपनी फितरत को भी कहीं खोती सी चली गई मै,

वो मेरी अपनी जिंदगी जो मेरी न हुई कभी , कभी इसके कभी उसके हिसाब से चली हो जैसे ,

आज वो भी हिसाब माँगती सी मिलती है , मुझे की तूने जिनके लिये गंवा दिया मुझे ,

वो तेरे अपने भी तो नही हैं तेरे ,

ईन आँखों मे ये सवाल लिए आज आईना भी न देख सकी मैं …

साँस छुटे तो जिंदगी मिले अब,

भीड़ दुनिया में इतनी है कि सांस लेना मुश्किल है,

तन्हाई जिंदगी में इतनी है कि आवाज़ दो तो कोई

सुनने वाला नही ,

बेमतलब सी है जिंदगी ,

मतलबी सब लोग हैं यहाँ ,

साँस छुटे तो जिंदगी मिले अब मौत का मज़ा ,

ले लिया है , वो जो कहते हैं न कुछ जरूरत हो तो

बताना , जरूरत पड़ने पर सबसे पहले वही

ओझल हो जाते हैं आँखों से ,

साँस छुटे तो जिंदगी मिले अब , अपनो के करीब

अपनो की तलाश में एक साया सा रहता है ,

वो साया भी अब ओझल होने को है शायद ,

बाद मेरे मेरी तलाश करोगे तुम अब ,

साँस छुटे तो जिंदगी मिले अब ,

यहाँ सलाहें बहुत मिलती हैं साथी नही मिलते अब ….

कड़वी हवा

बंजारे लगते हैं मौसम,

मौसम बेघर होने लगे हैं,

जंगल ,पेड़ ,पहाड़, समंदर,

इंसा सब कुछ काट रहा है,

छील छील के खाल ज़मी की ,

टुकड़ा टुकड़ा बाँट रहा है ,

आसमान से उतरे मौसम,

सारे मौसम बेघर होने लगे हैं,

मौसम बंजर होने लगे हैं,

दरियाओं पे बांध लगे हैं,

फोड़ते हैं सर चट्टानों से ,

बादी लगती है ये ज़मी,

डरती है अब इंसानों से,

बहती हवा पे चलने वाले ,

पांव पत्थर होने लगे हैं,

मौसम बेघर होने लगे हैं….

#गुलज़ारसाहब

#happy birthday gulzaar sahab….

Lines from kadwi hawa ….

🤗🤗

खुद से छलावा

करता है ये मन ,

दुखी हो फिर भी,

दिखावा करता है ये मन ,

हंस कर मिलना न हो,

फिर भी मिलता है ये मन,

लोग जानते हैं फिर पूछते हैं कैसे हो ?

जान बूझकर कर हम भी कह देते हैं ठीक हैं,

ऐसे तो बस विरले ही हैं जो जानते हैं कैसे हैं हम …

#बसएकख्याल

बाबरी विध्वंस

6 दिसम्बर 1992

बाबरी विध्वंस जब हुआ बहुत छोटी थी मैं

9 वर्ष की उस आयु में , उस वक्त कुछ समझ नही

आया अचानक से हुआ क्या ?

कई दिन तक कर्फ्यू लगा ऑफिस , स्कूल सब बन्द

घरों में डंडे ईट मिट्टी का तेल वगैराह सब इकट्ठा

किया जाने लगा , हम बच्चों का खेलना बन्द हो गया

आदमी लोग सारी गलियों के मोड़ पर अलग अलग

वक्त ड्यूटी कर रहे थे , लड़के सब गली भर में औरतें

और बच्चे सब एक साथ खाना पीना होता था। सब

इकट्ठा होकर रह रहे थे मोहल्ले के मुस्लिम परिवार

भी एक साथ ही थे। किसी तरह की लड़ाई तो नही

हुई , पर वो दहशत कभी गयी नही दिमाग से।

खैर वक्त जब बीता पड़ते पड़ते समझ आया यहाँ तो

अपने हिंदुस्तान में, अपने ही घर मे, अपने ही जन्म

स्थान में,

राम के मंदिर और जन्म स्थान को लेकर

एक विवाद चल रहा है।

वो राम जिन्होंने जीते जी 12 वर्ष के बनवास की सजा

काटी अब उनके जन्म स्थान और मंदिर को लेकर

विवाद अभी खत्म नही हुआ ।

राम ही खैर करे इन समाज के बुद्धिजीवियों की ,

आम इंसान तो बस इंतजार में है कि कब राम मंदिर

बनेगा या इस कलयुग में उसमे भी प्रभु की माया है।

पर लखनऊ में गंगा जमुनी तहजीब का परिचय बहुत

खूब दिया था उस वक्त।

यहां बस मेरा विचार है , और जो घटना हुई जितनी

याद है वही लिखा है मैंने।

किसी को आहत करने की कोई मंशा नही , बस एक

विचार है। 🙏

#बसएकख्याल

मिष्ठी

Q- इतनी मिठाई कौन खाता है भाई ?

A- बंगाली |

आज के दिन ही इतनी मिठाई रोशोगुल्ला, चमचम, मलाई रोल, नॉलेल गुरेरे पायस ।

फ्रीज की शक्ल देखने का मन नही कर रहा है ।

😂😂😂

भारत

ये वो विविधता से भरा देश है

जहाँ सूरज ,चन्द्रमा , हवा ,पानी , अग्नि को देवता

माना गया है,

जहाँ देवी की पूजा होती है , और तो और कन्याओं

की भी पूजा होती है,

औरत को देवी मानने वाले इस देश मे सबसे

ज्यादा अत्याचार भी औरत पर ही हुए हैं ,

आध्यात्मिक पुराण रामायण, महाभारत उदाहरण है,

जहां सीता और द्रौपदी जैसे तमाम महिलाओं के साथ

तमाम तरह के अत्याचार हुए ,

लड़कियों को पैदा होने से पहले ही कोख में मार

दिया जाना ,

पढ़ने के लिए स्कूल न भेजा जाना , एक ही घर के

लड़को को प्राइवेट स्कूलों में भेजना और लड़कियों

को सरकारी स्कूलों में भेजना ,

पढ़ी लिखी लड़की की शादी में भी दहेज की मांग

होना ,

उसके बाद परमेश्वर रूपी पति द्वारा उत्पीड़ित किया

जाना जिसके लिए अगर वो आवाज उठाये तो मायके

और ससुराल वालों द्वारा ये कहा जाना कि “ये तो

जीवन का खेल है एडजस्ट करो “

नारी शरीर के भूखे लोगो द्वारा पल पल अपने को

बचाना,

इन सबसे भी ऊपर है बलात्कारी द्वारा किया गया

अन्याय जिसके लिए “73 साल” बाद भी कोई

कानून नही आया है , फांसी की सज़ा होने पर भी

सालों फांसी न होना ,

एक केस सुना था बचपन मे “तंदूर कांड ” उस

आदमी ने अपनी बीवी को काट कर तंदूर में भून

दिया था। हुआ क्या कुछ सालों की सज़ा और अब

वो आज़ाद है।

“मत करो देवी की पूजा जब जीती जागती औरत

की इज्ज़त नही कर सकते “

दुःख होता है ।

जहाँ इंसान की कोई कीमत नही ,

नए जीवन को जन्म देने वाली औरत की कोई

इज्जत नही, कुल को आगे बढ़ाने वाली औरत की

कोई इज्जत नही ,

विविधताओं से भरा देश भारत , नारी सम्मान को

अभी भी तरसता भारत….

#बसएकख्याल

नींद तो अपनी होती थी कभी

ये रातें कुछ जागी जागी सी रहती हैं अब ,

नींद पे तो कर्ज़ सा रहता हो जैसे अब ,

रात अपनी न सही ,

पर नींद तो अपनी होती थी कभी ,

अब तो वो भी आने का ब्याज चाहती हो जैसे ,

इतने दिनों से न आई है ,

किसी और कि जिंदगी में शामिल हुई हो जैसे ,

सब कहि चले गए हैं जैसे ,

ये निंद भी कही चली जैसे …

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